We Wish You a Merry Christmas and a Happy New Year

As any year draws to a close, some despondency is inevitable. One looks back at the sands of time that one has let slip through gaps in tight-clenched fists. Achievements of the year seem insignificant when measured against disappointments and unrealised dreams. The opportunities lost during the year, as also in the past, come to mock one, especially in that grey zone between being wide awake and fast asleep.

For us, my wife and I, the year 2020 had an exciting start; with the bursting of crackers and bright fireworks shooting high into the sky, their reflection shimmering in a placid sea. It was an exotic setting that a stay-at-home couple like us would have found difficult to imagine – on a remote island off the coast of Cambodia. The end of this year would also have been difficult for us to imagine – an end so dull that even a couple like us will consider it boring. Just the two of us cloistered at home, with not even the next door neighbour to share a drink with.    

I am sure I am not the only one who can’t wait for this bizarre year to end. So today, with a week or more yet to go, I bid farewell to 2020! Good riddance to a year which made us realise we all have unsuspected vulnerabilities. A year in which we also discovered we had unexpected strengths. We realised that there is so much we can live without. And so much that we cannot live without.

No one is perfect, and before this year came around, all of us in our own ways had got accustomed to our frailties. Thus I was quite reconciled to the fact that I have diabetes and you were happy that you have only hypertension and she considered herself blessed that her asthma was mild.  But this year rudely termed our very human failings as ‘co-morbidities’, making us think that the traitors were our very own bodies! Unlike ever in the past, this year to stay healthy became an obsession, a pursuit and an end in itself for us.

I seem to have lost more friends this year than in any other. But it has always been thus. Each year is one more year added to all our lives and our ages. The Wuhan virus has managed to claim a few from among those we knew. Thus even as the tally might not be more, it certainly seems more unfair.

So, I cannot wait for this year to end. And I hope the coming year is different for you and for us. I wish everyone a year that should be unlike 2020!

I end with “Hanukkah Sameach!” to my Jew friends. “Happy Holidays!” to my oh-so-politically correct friends. “Joyous Erastide” and “Happy  Decemberween” to my friends with a literary bent of mind.  “Good Governance Day” greetings to all my sarkari and sanskari friends. “Heri za Kwanzaa!” to all my Afro-American friends and a Merry Christmas to all!

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सर का सफर

स्कूल में यार दोस्त हमेशा तू तड़ाक कर के बात करते थे। कॉलेज में भी कुछ ऐसा ही चलता रहा। मेरा नाम संबोधन कारक में “अबे!” और “ओए!” के अलावा कभी कुछ नहीं रहा। अगर किसी को बहुत ही प्यार आ रहा होता तो वह अपने राम को घोंचू कह कर बुलाता था।

लेकिन कॉलेज ख़त्म होने के साथ ही नौकरी लग गई। यकायक सब मुझे साहब और ‘सर’ कहने लगे। कई एक जूनियर तो मेरे से उम्र में काफी बड़े थे। वह भी मेरे को ‘सर’ ‘सर’ करते थे। ज़िन्दगी भर तो मैंने सिर्फ अपने अध्यापकों को ‘सर’ बोला था। अपने आप को ‘सर’ के रूप में देखने में बड़ा अटपटा लगा। कभी कभार सड़क चलते कोई “नमस्ते ‘सर’ ” कहता तो में पीछे मुड़ के देखता कि कौन से प्रोफेसर साहब आ रहे हैं।

थोड़ी शर्म तो ज़रूर आती है खुद कहने में लेकिन अपनी जवानी में मैं भी दिखने में बुरा नहीं था। तेईस चौबीस साल की उम्र में इकहरा बदन होने के नाते, मेरी उम्र के बारे में अच्छे अच्छों को गलतफहमी हो जाती थी। कोई सत्रह का समझता, तो कोई अठारह का।

इतनी ही उम्र में मैंने एक सब डिविजन में कार्यभार संभाला था । एक दिन दोपहर में मुफ्ती में अपने दफ्तर में बैठा था। एक नेताजी टाइप ने मेरे कमरे में प्रवेश किया और मेरे पर बरस पड़ा। ” शर्म नहीं आती? अपने पिताजी की कुर्सी में बैठा है? जल्दी से बुला साहब को, मेरे पास ज़्यादा टाइम नहीं है।”

कई बार बताया कि मैं ही साहब हूं, पर वह मानने को तय्यार ही नहीं था। “नाहक में क्यों परेशान करता है बउआ! बुला दे ना अपने पिताजी को।”

एक बार तो मुझे खुद गलतफहमी हो गई। एक दिन जब में घर के सामने छोटे से बागीचे में अख़बार पढ़ रहा था, एक महाशय मेरे घर सवेरे सवेरे पहुंचे । उन्होंने गेट से ही पूंछा ” वर्मा साहिब हैं क्या?”

मुझे खुद ‘साहब’ बने कुछ एक महिने ही हुए थे और ज़िन्दगी भर “वर्मा साहिब” संबोधन सिर्फ अपने पिताजी के लिए सुना था। बिना कुछ सोचे, कह दिया, ” नहीं वर्मा साहिब तो नहीं है। मैं उनका लड़का हूं, बताएं क्या काम है?”

बाद में उन महोदय को ये बात समझाने में काफी वक्त लगा कि वास्तव में जिन वर्मा साहब को वह खोज रहे थे वह मैं ही था।

तो इस तरह कॉलेज से निकलते ही मैं साहब और सर बन गया। वह जो अफसरशाही वाले साहब और सर के सरोवर में डुबकी लगाई, उससे निकलने में चालीस साल लग गए।

इन चालीस सालों में वह इकहरा बदन कब दोगुना या तीनगुना हो गया, मालूम ही नहीं पड़ा। बदन बदल गया सो बदल गया, ये भी पता नहीं चला कि बालों की सियाही और पांच छः दांत कहां गायब हो गए। दिखाने को रह गए ये झूके हुए कंधे और बेल्ट की कैद से भागती सी ये तोंद।

रिटायर होने के बाद, मैं और मेरी बीवी एक ‘सोसायटी’ में रहने लगे हैं। यकायक जैसे में साहब और सर बना था, उतनी ही फुर्ती से मैं अंकल और बाबाजी बन गया हूं। छोटे बड़े, आस पास के घरों के लोग सब मेरे को अंकल बुलाते हैं। और मेरी बीवी को आंटी। कभी कभार, एक पुराने खिज़ाब के एडवरटाइजमेंट की तरह, मेरे को अंकल और बीवी को दीदी कह कर मेरे सफेद बालों का मज़ाक उड़ाते हैं।

कोने के घर में एक अधेड़ उम्र के रिटायर्ड बाबू है जो लगभग मेरी उम्र के ही होंगे। वह तो मेरे को हमेशा अंकल बुलाते हैं, और मेरी पत्नी को दीदी। अपने छोटे पोते से कहते हैं “दादाजी के पांव छुओ। दीदी को नमस्ते बोलो।”

तबीयत कोफ्त तो होती है, लेकिन क्या करूं? यह तो कह नहीं सकता कि इन को दीदी नहीं, दादी पुकारो।

कभी कभी सोचता हूं वह दिन मैंने क्यों नहीं देखे जब कोई मेरे को भी भाई साहब, या बन्धु या कॉमरेड बुलाता। कोई तो होता जो कहता ” यार”, या “जाने भी दो यार।” मैंने तो अपने लिए वो प्यार भरे शब्द – दाज़ू, दादा, मोटा भाई या अन्ना – कभी नहीं सुने। मैं तो किसी से ‘चचा’ सुनने को भी तरस गया, क्योंकि यार दोस्त ही चचा बुला सकते हैं, और यार दोस्त कॉलेज छोड़ने के बाद कभी हुए नहीं।

कभी कभी मन करता है दफ्तर का ही एक चक्कर मारा जाए। लोग ‘ सर’ बोलें या साहब, इस अंकल और बाबाजी की उपाधि से तो कुछ समय के लिए छुटकारा मिल जाएगा। फिर यही सोच कर नहीं जाता की बाहर खड़े संतरी ने “ए बुड्ढ़े” कह कर रोक दिया तो मैं कहां मुंह छिपाऊंगा ?

ये पखवाड़ा है हिन्दी का !

कन्हैयालाल जी को चाहें कोई भला बुरा कुछ भी कहता, यह कोई नहीं कह सकता था कि वह  बुरे थे अध्यापक। ना जी ना। कत्तई नहीं।

जहां  बुज़ुर्ग उन्हें पंडितजी बुलाते थेहम  विद्यार्थी उन्हें कहते थे माटसाब वह हिन्दी के प्रगाढ़ पंडित थे और साथ में थे बड़े सख्त। एक बार जो बात समझा देते थे, मजाल है कि कोई वह बात भूल पाता इस ज़िन्दगी में।

एक बार उन्होंने हम सब को लेख लिखने का दिया होमवर्क, जिसे हम कहते थे गृहकार्य। बाकी बच्चों ने वही घिसी पिटी तरह लिखा, लेकिन हमने लिखा एक फड़कता हुआ निबन्ध। हम ने भाषा का नए ढंग से किया था प्रयोग और हमारा अनुमान था कि माटसाब को नयी शैली आएगी पसन्द।

लेकिन हाय! नहीं अाई पसन्द। नापसन्द  ही नहीं, माटसाब तो हो गए आगबबूला

बकवास! ये कोई तरीका है लिखने का? क्रिया कहां है, क्रिया? बेवकूफ! भूल जाते हो हमेशा! हिन्दी में वाक्य के अन्त में संज्ञा होगी, सर्वनाम और कुछ। होगी सिर्फ और सिर्फ क्रिया!”

अब इस तरह की बात हम कैसे मान लेते और वह भी आसानी से ?

हम ने भी पूछा सवाल।माटसाब, माटसाब! आपकी बात हमें लगती है तर्कहीन। फिल्मों के गानों के बारे में कभी सोचा आपने? जैसे किहै अपना दिल तो आवारा‘ ; ‘ ये रात भीगी भीगी ‘, ‘मेरा जूता है जापानी‘ ; ‘मेरे पिया गए रंगून‘ ; ‘जागो मोहन प्यारेऔर जाने कितने और। आप ही बताइए कि वाक्य के अन्त में क्रिया  है कहां ? किसी वाक्य के अंत में संज्ञा है, किसी में विशेषण तो किसी में क्रिया विशेषण!”

माटसाब को गया गुस्सा। लगे चिल्लाने ज़ोर ज़ोर से।बेशरम! गधा! बदतमीज! निकल जाओ क्लास के बाहर। अभी!”

लेकिन हम ठहरे पृथ्वीराज चौहन के वंशज! पीछे हटना तो हम जानते ही नहीं।

माटसाब, एक पत्रिका है धर्मयुग। और एक है साप्ताहिक हिंदुस्तान। दोनों में सभी  लेखों के शीर्षक में या तो जुम्लेबाजी होती है, या होती है तुकबंदी। ऐसी ही पत्रिकाओं से तो हमें भाषा के बोलचाल वाले रूप का होता है ज्ञान!”

बेवकूफ! ओंधी खोपड़ी वाले!” माटसाब ने आव देखा ताव; कनपटी पर रसीद दिए तीन चार। हम थे तो दुखी, किन्तु रहे  चुप के चुप। 

और फिर माटसाब ने समझाया कि कविता और फिल्मी गाने ठीक है अपनी जगह, लेकिन बाकी भाषा के होते हैं नियम ये भी समझाया कि ज़रूरी नहीं कि भाषा क्लिष्ट हो, या  प्रयोग में लाए जाएं  केवल शुद्ध हिन्दी के शब्द। लेकिन वाक्य का रूप तो होना चाहिए व्याकरण के अनुसार! इसी सिलसिले में क्रिया  का महत्व समझाते हुए माटसाब ने श्राप दे डाला ऐसी पत्रिकाओं को जो ऊटपटांग शीर्षक में रखती हों विश्वास। साथ में लंबा भाषण भी दिया, जिसमें उन्होंने गिना दीं क्रिया की विशेषताएं, धातु, भेद, अकर्मक, सकर्मक क्रिया और पता नहीं क्या क्या। 

ज़्यादा तो पल्ले पड़ा नहीं, लेकिन जो बात समझ अाई वह गांठ बांध ली हमने। और वह थी कि अंग्रेज़ी मे भले ही क्रिया कहीं भी चेप दो, हिंदी में क्रिया आती है वाक्य के अंत में। आरंभ में, बीच में। केवल अंत में। और शायद इस मूल मंत्र की अव्हेलना करने के कारण  ही दिवालिया निकल गया होगा धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान का! दोनों पत्रिकाएं जाने कितने साल पहले हो चुकी हैं बन्द।

समय तो आखिर है समय। अच्छा बुरा जैसा भी हो, जाता है गुज़र। होते होते हम बड़े हो गए और अब बूढ़े। माटसाब  भी  चल बसे कई साल पहले। उनकी याद कभी कभी आयी तो ज़रूर, क्योंकि ज़िन्दगी भर  उनके  बताए क्रिया के प्रयोग के नियमों का हमने पालन किया अच्छे से। कभी भी किसी को मौका नहीं दिया कि वह उंगली  उठाए हमारे हिन्दी के ज्ञान या निपुणता पर।

लेकिन अब बुढ़ापे में  दोबारा सोचना पड़ रहा है कि क्या हमारा विश्वास सही है या नहीं। क्या वास्तव में क्रिया वाक्य के अन्त में ही आती है, कल, आज और हमेशा ? हमारी छोटी सी पोती, मुनियाही  है जिसने हमें डाल दिया है इस असमंजस में।

अभी कल परसों की है ये बात। मुनिया भागी भागी अाई और बड़े प्यार से कहा, ” दादाजी! दादाजी! अभी जो हिन्दी पखवाड़ा चल रहा है उस पर ये है मेरा निबन्ध!”

हम ने देखा उसका  लेख। सभी कुछ टेढ़ा तिरछा! खास तौर से क्रिया का प्रयोगया तो वाक्य के बीच में या बिल्कुल नदारद। कभी यहां, तो कभी वहां। हमें मालूम है कि मुनिया हर बात को सोचती है अंग्रेज़ी में और लिखती है हिन्दी में।  इसी लिए क्रिया कभी यहां और कभी वहां। हम को तो माटसाब का पढ़ाया हुआ सबक अच्छे से है याद। बता दिया मुनिया को कि ये सारा का सारा है त्रुटिपूर्ण।क्रिया वाक्य के शुरू में होती है बीच में, वह तो आती है वाक्य के अंत में। लिख कर लाओ दोबारा!”

लेकिन वह नहीं मानी, आखिर है तो हमारी पोती। बोली, “मैंने तो दादाजी आज कल के  स्टाइल में लिखा है सब कुछ। आप को विश्वास हो तो देख लीजिए खुद ही।

हाथ पकड़ कर ले गई टी वी के सामने। और एक के बाद एक कई टी वी सीरियल के गिनवा दिए नाम।ये रिश्ते हैं प्यार के‘; पता नहीं किसका उल्टा चश्मा ‘, ‘जादू जिन्न का‘; ‘साथ  निभाना साथिया’  औरकौन बनेगा करोड़पति‘!

 सभी में व्याकरण की बेलज्जा अव्हेलना और कई एक में तो क्रिया का बोध ही नहीं!

मुनिया ने और जो बताया उससे हमें लगा कि ये बीमारी तो बॉलीवुड मैं भी गई है फैल। एक शब्द के नाम वाली फिल्मों को छोड़ कर, जिस फिल्म को देखो, उसका नाम ही है या तो अशुद्ध या भ्रांतिपूर्ण। जैसेहम आपके हैं कौन‘, ‘ज़िन्दगी मिलेगी दोबारा‘  आदि। और तो और, एक फिल्म का नाम थातू ही मेरा सन्डे‘ ! बिल्कुल बेतुका!

फिर  हमारी मुनिया ने दिखाए टी वी वाले समाचार। सब सुर्खियां रोचक और तुकबंदी वाली या  धमाकेदार! किन्तु एक में भी  क्रिया का सही प्रयोग नहीं! हम  स्तब्ध से देखते रह गये सारी सुर्खियों को – ‘शारजाह में घमासान‘, ‘किसानों  को होगा कितना फायदा ‘ , ‘ बेल के पहले होगईं बेनकाब ‘, ‘ डूब गई महानगरी‘, ‘लोक सभा का सत्र समाप्त‘, ‘ महंगाई ने बिगाड़ा रसोई का स्वाद‘; ‘बिल से श्रमिकों के अधिकारों पर चलेगी कैंची‘!

अरे भाई, व्याकरण  जैसी चिड़िया का नाम सुना है कभी?

हमारा तमतमाया हुआ चेहरा देख कर हमारी पोती ने कुछ पाक कला  अर्थात कुकरी शो की ओर  किया इशारा। इन चैनलों की हिन्दी तो थी और भी माशाअल्लाह! “एक स्पून ऑयल ले कर डालें  पैन में!या फिर वेजिटेबल्स को डाइस करने के बाद सौट कर लें और फिर होने दें कूल।”  “टमाटर कट करें और बॉयल होने के बाद करें स्ट्रेन!”  हो मोरे रामा अजब तोरी दुनिया!

बहुत कुछ देखा टी वी में – सुर्खियां, शीर्षक, विज्ञापन। सभी में संज्ञासर्वनाम, विशेषण तो थे, लेकिन क्रिया का नाम ही नहीं। और अगर क्रिया कहीं थी भी, तो छुपी सी, शर्माई सी; कहीं वाक्य या सुर्खियों के बीच में! ऐसा प्रतीत हुआ मानो धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान संजीवनी पीकर फिर गए हों धरती पर! अच्छा ही हुआ कि हमारे  बेचारे माटसाब गुज़र गए कई साल पहले। वर्ना आज के इस युग की हिन्दी, और खासकर क्रिया के प्रयोग करने के तरीके को देखकर तो उनका टूट ही जाता दिल। या वह कर लेते आत्महत्या!

कहां से कहां गई है हमारी भाषा? अभी हाल ही में तो भारत सरकार ने मनाया थाहिन्दी दिवस‘  और अब चल रहा है हिन्दी पखवाड़ा। कुछ मामला जमा नहीं। इसीलिए सब मिल कर लगाओ नारा  – हिन्दी पखवाड़े का बोलबला! चाहे होता रहे हिन्दी का मुंह काला!

 

 

 

 

घोर कलयुग

 

जब हम छोटे थे,  ज़माना कुछ अलग था। पढ़ाई लिखाई भी अलग थी। आधी घर में, आधी स्कूल में। और कुछ स्कूल और घर के बीच में आते जाते। स्कूल में न कभी किसी बात का डर, न किसी बात का रोना। बस, बाबूजी से फीस के पैसे लिए, जमा किए और हो गया काम।

न मां कभी स्कूल आईं, और न ही कभी बाबूजी को फुर्सत मिली।

जब साल ख़त्म होता, तो हम सब को बता देते कि पास हो गए। उस सतयुग में परसेंटेज तो दूर, कभी किसी ने  डिवीजन तक नहीं पूछी।

” बेटा पास हो गया! बेटा पास हो गया!” का शोर होता और सारे मुहल्ले में लड्डू बांटे जाते। कभी कभी तो ये खुशखबरी जलगांव वाली बुआ और रामपुर वाले मामाजी को भी पोस्टकार्ड द्वारा पहुंचाई जाती।

लेकिन स्कूल की पढ़ाई से ज़्यादा, जो हम  घर में सीखते थे उसकी अहमियत थी।

बड़ो का आदर करना। तमीज़ से बात करना। सोच समझ कर पैसे खर्च करना। साफ सुथरे कपड़े पहनना। सच बोलना। उधार नहीं लेना। झूठी शान से दूर रहना। अपने परिश्रम से पैसे कमाना। किसी भी तरह का ढोंग नहीं करना।

इन सब विषयों की न तो कोई किताब थी, न सिलेबस।  न ही कभी क्लास लगी और न ही होमवर्क मिला। लेकिन कभी अगर एक भी सबक याद नहीं हुआ तो मां अच्छे से समझा देती थीं। और अगर फिर भी कोई सबक याद नहीं होता, तो बाबूजी तो बहुत ही अच्छी  तरह समझा देते थे!

जब तक हमारे बच्चे स्कूल जाने लायक हुए, ज़माना बदल गया था। घर में तो हमने भी अपने बच्चों को ज़िन्दगी के ज़रूरी सबक पढ़ाए, लेकिन ये स्कूल वाले,  वजह बेवजह, बच्चे की पढ़ाई के बारे में बात करने के लिए हमें स्कूल बुलाने लगे।

अरे भाई, फीस भर तो दी! अब पढ़ाने का काम तुम्हारा है! हमें क्यों बार बार बुलाते हो? कभी पी टी ए के बहाने, तो  कभी ड्रामा तो कभी पी टी शो। क्या मां बाप को और कोई काम नहीं होता? हमनें सोचा, “कलयुग आ गया है, रीत बदल लो।”

बदलते ज़माने के हिसाब से हमने अपनी रीत बदल ली। जब जब हमारे बच्चों की टीचरजी ने बुलाया, हमने जा कर स्कूल में हाज़िरी लगाई।

लेकिन भला अब बुढ़ापे में क्यों स्कूल जाएं?  अजी कलयुग आ गया है, कलयुग!

ये स्कूल वाले बच्चों के मां बाप को तो बुलाते ही हैं, नाना नानी, दादा दादी को भी लपेट लेते हैं! कभी ग्रैंडफादर डे कह कर तो कभी सीनियर्स डे कह कर।

अगर मालूम होता कि स्कूल से पास होने के बाद भी स्कूल जाना पड़ेगा, तो हम तो शुरू में ही स्कूल न जाते!

एैसे ही एक ग्रैंड पेरेंट्स डे में मैं और मेरी घरवाली, दोनों को कुछ महिने  पहले नाना नानी की हैसियत से स्कूल जाना पड़ा। बहुत बोर हुए, लेकिन क्या करते? मुन्नी की मुनिया, मतलब हमारी धेवती , का मन रखने का सवाल था। 

तीन चार घण्टे का प्रोग्राम । न पान थूकने की जगह न सिगरेट की कोई दुकान। टीचर लोग अलग अंग्रेज़ी में गिट पिट किए जा रही थीं। कुछ तो समझ आया लेकिन डर था कि कोई ज़रूरी बात न छूट जाए।  झेंप भी आ रही थी कि मुनिया जब पूछेगी “प्रोगराम कैसा लगा?”, तब ये तो नहीं कह सकते हैं कि कुछ ज़्यादा समझ नहीं आया?

यही सोच कर मैंने इधर उधर देखा और एक तरकीब निकाली। पास में खड़े एक सूटेड बूटेड बुज़ुर्ग से मैंने कहा,  “मैं दादा हूं।”

उसने कहा, ” आप जरूर  होंगे, क्योंकि स्कूल में ‘दादा दादी डे’ के लिए चचा लोग को तो कोई नहीं बुलाता।”

मैंने फिर दोहराया, “दादा हूं। दरियागंज का!”

टाई धारी को अब बात समझ में आई। झट से उसने अपना बटुआ जेब से निकाल कर दे दिया।

” नहीं जनाब, आप गलत समझे,” मैंने कहा। “मैं दरियागंज का दादा हूं तो मैंने इसलिए कहा कि आप मेरी बात मानने से इंकार न करें।”

” जी बोलिए,” उसने कहा।

कुछ लजाते हुए मैंने कहा, “ये जो टीचर गिट पिट कर रहीं है, वह मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा है। आप मेरे साथ ही रहिए। कोई काम की बात हो तो हिंदी में मेरे को बता दीजिएगा।”

बच्चों का प्रोग्राम बहुत देर तक चलता रहा। सब अंग्रेजों की औलाद, अंग्रेज़ी में पता नहीं क्या क्या बतियाते रहे। हमारे साथ जो टाईधारी बुज़ुर्ग थे, वह हमें हिंदी में समझाते रहे। कई बार लगा कि वह कुछ गलत बता रहे हैं, लेकिन यह सोच कर मैं चुप रहा कि टाई पहनी है तो सही ही बता रहे होंगे।

प्रोग्राम ख़त्म हुआ तो ओपचारिकतावश मैंने पूछ लिया, “मेरी मारुति कार यहीं है। आप को कहीं छोड़ सकता हूं क्या?”

उन सज्जन का जवाब सुन कर मैं तो दंग रह गया।

बड़े अंदाज़ से उन्होनें कहा, “न जी न। हमारी चार चूड़ी ले कर डिलैवर अभी आ जाएगा।”

चार चूड़ी? मैं और मेरी बीवी काफी असमंजस में थे कि ये चार चूड़ी क्या बला है। तभी उनका ड्राइवर कार ले कर आ गया। ये तो मेरे को भी अपनी टूटी फूटी अंग्रेज़ी में मालूम था कि इस कार का नाम  ऑडी होता है। अब समझ में आया कि हमारे टाईधारी अनुवादक का ‘चार चूड़ी’ से तात्पर्य उनका अपनी ऑडी कार से था।

साथ ही समझ आ गया कि भाई साहिब को अंग्रेज़ी का अलिफ बे पे भी नहीं आता! और जो ये जनाब हमें प्रोग्राम के बारे में हिंदी में बताते रहे, वह सब बंडलबाजी था! 

“तो आप भी अंग्रेज़ी में….” मैं हैरानी से उन्हें तकता रह गया।

“जी हां, खा गए न आप भी धोखा? मैं तो बिल्कुल अनपढ़ हूं। लेकिन ये टाई और सूट मैं अब हमेशा पहनता हूं। बड़े काम की चीज़ हैं। दो साल पहले, हाई वे वालों ने सड़क बनाने के वास्ते मेरे खेत खरीद लिए थे। बढ़िया पैसे मिले, और उन से मैंने एक कोठी, दो मरसरी की गाड़ी और एक चार चूड़ी खरीद ली। और ढ़ेर सारी टाईयां । अब तो मैं भी साहब बना फिरता हूं।”

और वो टाईधारी धोखेबाज़ अपनी चार चूड़ी में सवार हो कर चल दिया । ‘डिलैवर’ के साथ!

उस दिन को याद कर के मैं और मेरी घरवाली अब अक्सर ये बातें करते हैं – “हमने भी टाई पहनी होती तो ऐसा होता। हमने भी टाई पहनी होती तो वैसा होता।”

क्योंकि आज वही ज्ञानी है जिसके पास चार चूड़ी और चार टाई हैं। हाय कैसा कलयुग आ गया है! घोर कलयुग!!

 

Let Us Count Our Blessings

In the middle of an unprecedented pandemic, uneasy relations with our neighbouring countries and a bleak economic situation, the attention of the whole nation is riveted on the death of one film actor. 

The major ingredients that define our existence as a country are all there – politics, crime, sleaze, sex, women, Bollywood, CBI, ED, court room dramas! And a hint of drugs!

Our elders always taught us that we should be grateful for His mercies, no matter how small.  

So let us be thankful that none of the dramatis personae played cricket!

 

The Republic Day Parade

               छब्बीस जनवरी

कहीं से इक कराड लाये, हाथ पैर जोरे।

गरम बिस्तर छोर उठे, सवेरे सवेरे।

पैदल चल कर जूता घिस्यो, धक्का मुक्का खाये।

जगै पाने जल्दी पहुंच्यो, घंटन यूं बिताये।

भीर थी लाखन वहां, कुचरो अपनो पाँव।

सभै लोगां धक्का मारें, कैसो है ये गांव ?

फिर तो मेला सुरु हुयो, लोगाँ बोलें अच्छो है।

हमको तो कुछ दीखत नाहीं, पुलिस का पहरो रखो है।

आज से हम खायें कसम, राम ही  बचाये

जो आगे कोई दिन, हमको यूं नचाये।

टोपी गयी, कोट गयो, अंगोछन भी छूट गयो।

सिर फूट्यो भीर में ओर हाथ पैर टूट गयो ।

आगे हम कभी भी, ऐसे अब न जाएं
जाएं भी तो तबन ही, जब परसिडेंट हो जाएं।
Written years ago – When it was possible to ‘borrow’ a card for witnessing the parade and Kaka Hathrasi was the gold standard of light poetry!

Chandra Yatra

जनता में एक दिन भई मचा हुआ था शोर 
भारत भी लो अब चला, चला चाँद की ओर। 
गोरमेंट ने ध्यान दे, बनाई थी इस्कीम, 

चाँद जाने के लिये , चुनी गई थी टीम। 

कई एक धरना दिए गए, बंध भूक हड़ताल, 
हर इस्टेट में मचा रहा भई  महिनों तक बवाल ।
आख़िर में पूरब में बना इंडिया का राकिट बेस 

काम तब शुरू हुआ जब पूजा हुई गनेस। 

भारत का था धन सारा, भारत की तकनीकी, 
थोड़ा विज्ञान, थोड़ा अज्ञान और बाकी राजनीति। 
जैसे तैसे कर के बन गया चन्दर यान, 

(सच मानो तो लगता था जैसे कोई कबाड़ी दुकान) 

साम्प्रदायिक कारणवश चुने गए यात्री चार 
और भाषा के बेसिस पर थे चालीस उम्मीदवार 
उत्तर , दक्खिन, पश्चिम से भी लिये गए प्रतिनिधि, 

एक दो पुल से चुने गए जो थे मिनिस्टर संबंधी। 

कुल मिला कर इस तरह भई भारतनॉट थे सौ। 
लेकिन यान में जा सकते थे केवल यात्री दो। 
अन्त में किसी तरह टॉस कर के निपटारा हुआ, 

जय जवान, जय किसान, इस तरह का नारा हुआ। 

सब को आमंत्रण के दिये गए थे पत्र, 
प्रेस, मिनिस्टर, वी आई पी, यत्र तत्र सर्वत्र। 
वैज्ञानिकों के लिए  पर बची न कोई सीट, 

दूर से वो देख रहे हैं, यान से कोसों फ़ीट। 

राष्ट्रपति जी ने आकर किया बहुत आभार, 
यात्रियों की आरती भई उतरी बारंबार। 
सारी जनता उमड़ पड़ी भई, मजमा है या कोई मेला

भेलपुरी और गोगप्पे भी, और एक चाट का ठेला।

सौ फुट दूर खड़ा चंद्रयान सबको लगे सजीला 
उस पर लिखा भारत भी अच्छे से सब को दीखा। 
है जनता उस पर लिखे शब्दों में तल्लीन, 

भारत के नीचे लिखा है भैया “हमारे दो या तीन” ।

पंडितों ने पत्री से शुभ मुहूर्त निकाला 
राष्ट्रपति ने एक नारियल यान पर दे मारा, 
यान के यूं नामकरण से टूट गयी उसकी तल्ली, 

जल्दी उसे जोड़ा गया, लगा लगा कर बल्ली। 

सब कुछ आखिर ठीक हो गया। 
(विदाई गीत से हर कोई रो गया) 
जाने का जब समय निकट आ गया 

प्रश्न तभी एक विकट आ गया। 

यान में तो है नहीं हाय राम कोई इंजन! 
बोर होगए एकत्रित सब जनता और जनार्दन! 
जांच की एक कमेटी ने कई सालों बाद बताया, 

कारण है भई सीधा सादा, उत्तर रटा रटाया। 

मालगाड़ी इंजन ले इस्टेशन न आ पाई 
क्योंकि सारे वी आई पी ने ट्रेनें बुक कराई 
अब एक नया दिन, नया मुहूरत खोजना है 
इस साल नहीं तो अगले साल, नहीं तो अगली योजना है! 
(This was written in 1969, shortly after the US moon landing.)

Radio Vaartaa

अरे भाई बोला , पचास बार बोला। अगर अपनी आवाज़ ही सुननी है, तो टेप कर देते हैं, सुन लेना।  क्या प्रॉब्लम है? लेकिन नहीं!  इतनी आसानी से जान कहाँ छुटने वाली  थी? अपनी आवाज़ सुननी हैऔर आल इन्डिया रेडियो पर ही सुननी है।

खीज कर हमने भी कह दिया  “अगर अपनीआवाज़  सुनने का इतना ही शौक है तो जाओ, आल इन्डिया रेडिओ वालों से मिल कर बोलो, कुछ प्रोग्राम श्रोग्राम रिकॉर्ड कर लें। “

पता नहीं इतिहास में किस के क्या फेमस लास्ट वर्ड्स रहे होंगे। लेकिन ज़रूर कुछ ऐसे ही रहे होंगे । हमारे केस में हमारा इतना कहना था कि बस, मत पूछिए साहब कि हम पर क्या गुज़री!

कभी खाना खाते वक्त, तो कभी रात में सो जाने के बाद, बस एक ही सवाल होता था हमारी श्रीमती जी का – “क्यों जी, कब ले चलियेगा ऐ आई आर वालों के पास?”

एक दिन बड़ी मुश्किल से बॉस और ऑफिस वालों की नज़र से बच कर ले गए हम श्रीमती जी को आल इंडिया रेडियो।

पहला सवाल पूछा गया; “क्या आप गा सकती हैं?”

हम और हमारी श्रीमतीजी ठहरे खानदानी गाना सुनने वाले । गाना गाने का सवाल कभी पैदा ही नहीं हुआ । हमारी श्रीमतीजी की सिट्टी पिट्टी गुम ।

उस दिन तक हम समझ नहीं पाए थे कि बगलें झांकने का क्या मतलब होता है। समझ में आ गया । आखिर श्रीमतीजी के बगल में हम ही तो बैठे थे!

हमें भी काफी झेंप आई। थोड़ी चिन्ता भी थी कि आखिर ऑफिस में यार दोस्त बॉस को इस बहाने कब तक टालते रहेंगे कि “सर, चाय पीने गया है, आता ही होगा। “

लेकिन मन ही मन खुश तो थे ही । बोलने की हमारी हिम्मत कहाँ थी, मगर हम ने सोचा कि “चलो! श्रीमतीजी का अपनी आवाज़ ऐ आईआर पर सुनने का बुखार तो उतरा।”

लेकिन श्रीमतीजी ने भी सुना हुआ था किअलग अलग तरह की हट होती है; जैसे बाल हट; राज हट; श्रीमती हट ! श्रीमतीजी इतनी आसानी से मानने वाली कहाँ थीं ? 

पूछने लगीं , “आपको अंनोंनसर की ज़रूरत है? “

जिस लहज़े से उन्होंने पूछा और जिस किस्म का दुखी चेहरा उस ऐ आई आर के अफसर ने बनाया, अस से हम तो साफ़ समझ गए कि अगर आल इंडिया रेडियो में अंनोंनसर का अकाल भी पड़ जाये, तब भी हमारी श्रीमतीजी को इस शुभ कार्य हेतु आमंत्रित नहीं किया जायेगा।

उस ऐ आई आर के अफसर का हमारी श्रीमतीजी जैसी कई महिलायों से पाला ज़रूर पड़ा होगा। मंजा हुआ खिलाड़ी था।

टका सा जवाब कि, “ज़रूरत नहीं है”, कह कर जाने वाला ही था कि हमारी श्रीमतीजी ने उस को घूरा।

मैं खुद अपनी श्रीमतीजी की क्या तारीफ़ करूँ? इतना ज़रूर कहूंगा कि अगर वो झपटते हुए शेर को घूर कर देख लें तो शेर हवा मे ही रुक जाये। वो अफसर किस खेत की मूली था? बस आउट क्लास्ड समझिए साहब, बिलकुल आउट क्लास्ड!  रुक गया। रुका रहा।

हमारी श्रीमतीजी ने दोहराया। “आपको – किसी – अंनोंनसर – की – ज़रूरत – है ? “

इस बार तो उस बेचारे ने अपनी जान बचाने के लिए कह दिया; “अंनोंनसर   की ज़रूरत तो नहीं है लेकिन यदिआप कोई अच्छा सा लेख लिखकर लाएं तो हम आपकी वार्ता अकोमोडेट करने की कोशिश ज़रूर करेंगे। “

ये कह कर वो अफसर तो भाग गया।

रह गए हम।

उस दिन के बाद हमारे घर में तो केवल एक ही रटन लगी रहती थी।  “अजी सुनते हैं? कोई अच्छा सा लेख लिख दीजीए ना।”

हमको तो वैसे भी ऑफिस में पिछले तीन साल से ए सी आर में ” नोटिंग एण्ड ड्राफटिंग वैरी पुअर ” कह कर टाला जाता रहा है । अम्मा को तीन महीने में एक चिट्ठी अगर लिख दी तो हम समझते हैं कि क्रिएटिव  राइटिंग का कोर्स पूरा कर लिया। 

तो कैसे लिखें हम लेख ? और वो भी अच्छा सा ? 

लेकिन श्रीमतिजी की ज़िद। बहुत टाला । बहुत टाला तो कहना गलत होगा, दरअस्ल  टालने की बहुत कोशिश की ।

बोले हम ” ए आई आर वाले शुद्ध मातृभाषा चाहेंगे- हम खिचड़ी भाषी हैं।”

नहीं मानी।

बोले हम ” ऐ आई आर सुनने वालों को कोई टॉपिकल सब्जेक्ट चाहिए।”

बोलीं ” तो न्यूज़पेपर से पढ़ कर लिख दीजिए।”

हम ने कहा, हम ने कहा, हम ने कहा।  हम कहते रहे और वो हर बात को काटती रहीं। 

फिर साहब दौर शुरू हुआ हमारे लिखने का। शाम को घर में लिखने की कोशिश की, तो मुन्ने ने कागज़ का एरोप्लेन बना दिया । और मुन्नी यह कह कर रोने लगी कि “पापा ने मेरी नई पेंसिल चुराई।” 

बच्चों को किसी तरह चुप कराया। श्रीमतीजी की फटकार भी सुनी कि, “बस ! आप तो यूं ही हैं। कुछ भी नहीं कर सकते।”   फिर रात को लिखने की कोशिश की।

इंस्पिरेशन आने वाला था कि मुन्ने को पहले ही सुस्सु आ गया। आईडिया आया ही था कि मुन्नी जाग गयी और पानी मांगने लगी।

क्या बताएं, रात के बारह बजे तक कोरा कागज़ कोरा ही रह गया। 

सुनना भी पड़ा।

“अजी सो भी जाईये। सवेरे ऑफिस जाने से पहले आटा आपने पिसवा के लाना हैँ ।”

फिर ऑफिस में लिखना शुरू किया। हफ्ते भर कोशिश की। उसके बाद ऑफिस के पियन  ने साफ मना कर दिया कि वह रोज़ रोज़ मेरी वेस्ट बास्केट से मनों कूड़ा नहीं उठाएगा।

बड़े बाबु ने भी कह दिया “ऑफिस का कागज़ ऑफिस के काम के लिए होता है। इतने कागज़ से क्या बच्चों के स्कूल की कापियां बना रहे हो?”

बौस महोदय लेकिनअसमंजस में थे। हमारे जैसा मस्तमौला दिन भर अपनी सीट पर दीखता था। लंच ब्रेक में भी! और फाइल टस से मस न होती । जब हमें लगा कि नोकरी से भी हाथ धोने पड़ेंगे, तो कान पकड़े। ऑफिस में लिखना छोड़ा।

अब तो हम ढूंढ रहे हैं उस ऐ आई आर के अफसर को। 

अगर उसको मेरी और अपनी जान बचानी है तो वो ही कोई अच्छा सा लेख लिख दे। श्रीमतीजी उस लेख को ऐ आई आर पर वार्ता के रूप में पढ़ कर सुनाएं। अपनी आवाज़ सुनें। उन के मन को तसल्ली मिले। मेरी जान बचे।

और हमारे घर और ऑफिस की शान्ति पूनःस्थापित हो।